Saturday, January 22, 2011


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अयी  दयामयी देवी सुखदे सारदे , इधर भी निज वरदपाणी पसार दे ;
 दास की यह देह तंत्री सार दे , रोम तारों में नई झंकार दे |        
                                                                        
                   गणेश वंदना 
 गाइये गनपति जगबन्दन. सन्कर-सुवन भवानी-नंदन..१..
सिद्धि-सदन, गज बदन, बिनायक. कृपा-सिंधु, सुंदर, सब-लायक..२..
मोदक-प्रिय, मुद-मंगल-दाता. बिद्या-बारिधि, बुद्धि-बिधाता..३..
माँगत तुलसिदास कर जोरे. बसहिं रामसिय मानस मोरे..४..                तुलसीदास जी द्वारा रचित |

जितना सुनो , सर धुनों , सत्ता के स्वर सप्त
लोकतंत्र में अच्छों की, सदा जमानत जप्त ||
संग सत्ता के सदा रहो, सत्ता है सरताज
जनता केवल नाम की, बादशाह बेताज ||
जो संग सत्ता के रहा, उसके सँवरे काज
जो उसके विपरीत है, उसके बिगड़ें काज ||
उसके बिगड़ें काज , गुण सत्ता के गाए
जहाँ मिले, जितना मिले, वो उतना खाए ||
लोकतंत्र में हर मंत्री की , यहीं रही है आस
जिसका मक्खन ज्यादा हो, वो हो जाए ख़ास ||

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" स्वतंत्रता "
स्वतंत्रता का स्पंदन प्राणों का चैन है,
सुखदेव,भगतसिंह, राजगुरु की देन है |
गाँधी का अरमान , तिलक का ख्वाब है,
इसकी हिफाजत सबसे बड़ा सवाब है |
इसकी खातिर खुदीराम प्राणों का मोल लगाते है,
भारत के जन-गण मन में,मुक्ति का बोल जगाते है |
इसकी खातिर हँसते-हँसते बिस्मिल फाँसी झूल गए ,
पर मेरी पीढी वाले उनकी कुर्बानी भूल गए |
वे भूल गए सावरकर के उस साहस के अंदाज को,
कहाँ उन्होंने देखा था ? अन्यायी अंग्रेजी राज को |
हम याद रखे आजादी मुफ्त नही मिलती ,
बिना मिटे दाने के, कली नही खिलती |
बिन कष्टों के कोई भी आजाद नहीं हो पाता है,
घर में तो रहता है पर आबाद नहीं हो पाता है |
कहने को आजाद है पर आजादी अभी अधूरी है ,
सत्ता में सरदार पटेल का साहस बहुत जरुरी है |
क्योंकि स्वतंत्रता का स्पंदन प्राणों का चैन है,
सुखदेव,भगतसिंह, राजगुरु की देन है |
गाँधी का अरमान , तिलक का ख्वाब है,
इसकी हिफाजत सबसे बड़ा सवाब है |

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" To Rain "
How will farmers grow and gain
Unless sun bright stops the rain .
How will students go to school
Ways are closed and rivers full.
Grace of God the queen is rain
It gives life and clears the drain
Dark are days and dark is sky
Bright will be future, Let's try.

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 राम भरोसे देश है, राम भरोसे राज
राम भरोसे बैठे है , राम भरोसे काज |

 अपनी बाँहे अपना बल , छोड़ पराई आस,
जिसके आँगन में नदी, उसको कैसी प्यास |

हरी भरी धरती रहे , हरा भरा हो देश
हरी भरी हो संस्कृती, हरा भरा परिवेश ||
दू:ख किसी को ना रहे , मन में हो उल्लास
सदा सुखी सब जन रहे, दूर हटे संत्रास ||
आमद सबकी खूब बढे , महंगाई हो दूर
भ्रष्टाचार भी मिट जाए , समृद्धी भरपूर ||
 

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